श्रीमद्भागवत जैसे गम्भीर ग्रन्थ को आजकल गाने-बजाने तक सीमित कर दिया गया है। ( Hindi, English )

shrimadbhagwat jaise gambhir granth ko aajkal gane bajane tak simit kar diya gaya hai. govardhan math puri shankaracharya pravachan

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किसी श्रोता का प्रश्न - गुरुदेव! सोशल मीडिया पर ऐसे कई वीडियो देखने को मिलते हैं जिसमें व्यास पीठ पर स्वयं व्यास (कथावाचक) खड़े होकर नृत्य करते हैं, ठुमके लगाते हैं, तो क्या यह सही है?

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उत्तर - धन और मान तक जीवन सीमित रह गया है। गिने-चुने व्यक्ति ऐसे हैं जो धर्म और अध्यात्म का उपयोग जीवन को कृतार्थ करने के लिए करते हैं। जनता को नाचकर, गाकर किसी भी ढंग से लुभाना, अपनी ओर आकृष्ट करना और अपने स्वार्थ की सिद्धि करना एक व्यसन हो गया है। उस व्यसन के चपेट में कथा भी आ चुकी है। इस विसङ्गति का कारण यह है कि जब शासनतन्त्र दिशाहीन होता है, अक्षम होता है, स्तरविहीन होता है तब अराजक तत्व प्रश्रय प्राप्त करते हैं। यद्यपि कीर्तन का महत्व है, श्रीमद्भागवत के महात्म्य में प्रह्लाद इत्यादि कीर्तन करने लगे, ऐसा वर्णन आया है। लेकिन व्यासपीठ की अपनी मर्यादा है और समय-समय पर कीर्तन का भी उपयोग, विनियोग है। श्रवण, कीर्तन, यह सब नवधा भक्ति के सोपान हैं। लेकिन कीर्तन का भी उपयोग और विनियोग लोगों को रिझाकर धन-मान बटोरने में नहीं होना चाहिये। और विशेषकर श्रीमद्भागवत तो बहुत ही गम्भीर ग्रन्थ है। गाने बजाने तक उसे आजकल सीमित कर दिया गया है। मैं तो समझता हूँ कि धर्मसम्राट पूज्यपाद गुरुदेव स्वामी करपात्री जी महाभाग और स्वामी अखण्डानन्द सरस्वती जी महाभाग, पण्डित जनार्दन चतुर्वेदी जी इन सबके अदर्शन के बाद श्रीमद् भागवत कथा में बहुत विकृति आई है। रामचरितमानस के नाम पर तो अल्लाह का भी कीर्तन करवाया जाता है और क्या-क्या अनर्गल प्रलाप नहीं होता है। यह सब दिशाहीनता शासन तन्त्र की दिशाहीनता के कारण है।

मैंने गम्भीरतापूर्वक विचार किया कि बिहार, उत्तरप्रदेश आदि में मेधाशक्ति की कमी नहीं है लेकिन फिर अमुक-अमुक दल ने, व्यक्ति ने इन प्रान्तों में कैसे शासन किया? तो निष्कर्ष यह निकला कि जो राजनेता होते हैं वे जब अपने स्तर से घटिया स्तर समाज का बना देते हैं तब अधिक समय तक शासन कर पाते हैं। कहने को कोई IPS होता है, IAS होता है, लेकिन स्तर राजनेता इतना घटिया बना देते हैं तब वो अधिक समय तक शासन कर पाते हैं। क्योंकि अंग्रेजों की कूटनीति रही है है कि व्यासपीठ को अगर हम दिशाहीन कर दें भारत में तो भारत का अस्तित्व और आदर्श विलुप्त हो जायेगा। तो ये कथावाचक आदि भी प्रायः दिशाहीन हैं। एक श्लोक का भी उच्चारण नहीं कर सकते वे अब गाने-बजाने के माध्यम से भागवत के कथावाचक बन गये तो बहुत अच्छा हो कि कीर्तन कार्यक्रम नाम रखा जाये। भागवत का नाम क्यों बदनाम किया जाये। ठीक! खूब नाचो उसमें (कीर्तन कार्यक्रम में) कीर्तन के नाम पर। अब कोई रामचरितमानस की कथा का आयोजन हो और रामचरित उसमें हो ही नहीं तो कष्ट की बात होगी। भागवत तो बहुत गम्भीर ग्रन्थ है।

ये ठाकुर जी आदि जो कथा वाचक हैं वृन्दावन में, इनके गुरुजी, रामानुज जी, बहुत अच्छे विद्वान थे और हमारे श्रोता थे सन् 1972 से। राजवंशी द्विवेदी, दिग्गज विद्वान हमारे पूज्य गुरुदेव के शिष्य, सैकड़ों व्यक्तियों ने उनसे विद्याध्ययन किया, वे भी हमारे श्रोता होते थे। श्रीमद्भागवत के सन्दर्भ में हमने उन विद्वानों से कहा था कि आप लोग दर्शन को छोड़ रहे हैं, आपके चेले-चपाटे आगे चलकर कथा भाग को भी छोड़ देंगे। अंत में वही हुआ। पहले भागवत के जो कथा वाचक वृन्दावन के, उन्होंने दर्शन भाग छोड़ दिया क्योंकि बहुत कठिन है, गुरुगम्य विद्या है। लेकिन कथाभाग को नहीं छोड़ा। बाद में कथा भाग भी प्रायः छोड़ दिया, उसमें अधिकांश नाच-गान शुरू हो गया। तो विकृति आती है। बहुत अच्छा होगा कीर्तन मण्डली के द्वारा कीर्तन का आयोजन हो। कम से कम भागवत कथा में कथा भाग तो ले आयें। दर्शन तो बहुत कठिन है। उसके लिए तो 15-20 साल का अध्ययन लगातार चाहिये तब भागवत का दर्शन समझ में आयेगा।

एक हम संकेत करते हैं महाभारत को लेकर - महाभारत के कई संस्करण वेदव्यास जी द्वारा उपस्थापित किये गये। उसका अनुशीलन महाभारत के द्वारा ही प्राप्त है। चौबीस हज़ार श्लोकों का एक महाभारत जो कहीं सुलभ नहीं है, जिसका उल्लेख महाभारत में है। जिसमें केवल दर्शन भाग है, इतिहास नहीं है, आख्यायिका नहीं है। या केवल सम्वाद के रूप में… जैसे भगवद्गीता है। उसमें केवल श्रीकृष्ण-अर्जुन का सम्वाद, सञ्जय-धृतराष्ट्र का सम्वाद है और कुछ सामग्री जो सुलभ है वह सब दर्शन है। लेकिन चौबीस हज़ार श्लोकों को आत्मसात करना कठिन था, केवल दर्शन का पक्ष था। तब भगवान् वेदव्यास जी ने उन्हीं चौबीस हज़ार श्लोकों को फैलाकर शतसाहस्त्री महाभारत की रचना की, एक लाख श्लोकों वाला महाभारत। फिर भगवान् वेदव्यास जी ने बृहद् संस्करण बनाया। उसमें लाखों श्लोक परन्तु मर्त्यलोक के मनुष्य उन भावों को हृदयङ्गम नहीं कर सकते इसीलिए देवल, असित, नारद, व्यास, शुकदेव जी ऊपर के लोकों में उस महाभारत की कथा कहते हैं। तो मैंने कहा कि मूल महाभारत में चौबीस हज़ार श्लोक हैं। लेकिन वे हृदयङ्गम हो सकें, इसीलिये अन्त में दाल में नमक के समान दर्शन का पक्ष इतिहास और आख्यायिका के माध्यम से फिर उसको विस्तृत किया गया।

कल भी मैंने बताया था मूल श्रीमद्भागवत तो चार श्लोकों का है, चतुश्लोकी भागवत। उन चार श्लोकों के भावों को हृदयङ्गम करने के लिये विशाल भागवत की रचना की गई वेदव्यास जी के द्वारा। कल मैंने यह भी बताया था, एक श्लोक 'जन्माद्यस्य यतः....' श्रीमद्भागवत का, विचार करें तो उसी की व्याख्या बाकी जितने श्लोक हैं, सब हैं। तो दर्शन के द्वारा व्यक्ति का कल्याण होता है। लेकिन दर्शन को रोचक ढंग से इतिहास, आख्यायिका के माध्यम से व्यक्त करने पर दर्शन सरस बन जाता है। परन्तु हृदय तो दार्शनिक तथ्य ही होता है। उसी हृदय को ही छोड़ देंगे तो क्या होगा? कम से कम कथा भाग को तो, जहाँ तक हो सके नहीं छोड़ना चाहिये। और नाचने-गाने की ही बात हो तो कथा के प्रारम्भ में और अन्त में कुछ लोग नाच लें लेकिन उसमें अश्लीलता का ताण्डव नृत्य न हो। माताएँ, ये सब, बहुत ही शील का परिचय देकर उस कार्यक्रम में सम्मिलित हों। इतना मैंने विचारपूर्वक कहा।

सबका कारण है शासनतन्त्र की दिशाहीनता। शासनतन्त्र जानता है कि व्यासपीठ अगर आदर्श से युक्त रहे तो वे शासन नहीं कर सकते। समझ गये? क्योंकि उनका स्तर इतना घटिया है कि वो घटिया स्तर ही…. जो अध्यापक योग्य नहीं होता वो शरारती बच्चों को, खेलकूद करने वाले बच्चों को बहुत पसन्द करता है। और जो अध्यापक योग्य होते हैं वे मेधावी छात्र को पसन्द करते हैं। जब कभी हमारे प्रश्नपत्र आ जाते थे सरल, तब मैं कहता था कोई आनन्द नहीं आया। बहुत कठिन प्रश्नपत्र होता था तो मुझे प्रसन्नता होती थी।

तो हमने एक संकेत किया कि कथा में बहुत विकृति आई है। एक विचित्र बात है, कथा का अर्थ निरुक्त के अनुसार स्वामी अखण्डानन्द सरस्वती जी महाराज करते थे 'कथं'। जीवन और जगत् की जितनी समस्याएँ हैं सबका समाधान कथा के माध्यम से होना चाहिये। सबसे बड़ी समस्या तो मृत्यु की है, मृत्यु को सार्थक करने की समस्या सबसे बड़ी है। उसी का समाधान श्रीमद्भागवत में है या नहीं? तो मृत्यु पर विजय प्राप्त करने के लिए भागवत है। यह अन्तिम मरण हो… फिर जन्म लेना ही न पड़े। तो श्रीमद्भागवत का लक्ष्य क्या है? परीक्षित को मुक्ति प्राप्त हो। परीक्षित का अर्थ - परीक्ष्य लोकान्…. । इसके आधार पर परीक्षित नाम पड़ा है। गर्भ में अश्वत्थामा के दिव्यास्त्र से उत्पीडित परीक्षित की रक्षा भगवान् ने गर्भ में प्रकट होकर गदा के द्वारा की। श्रीमद्भागवत में दो विरुद्ध बातों का उल्लेख किया गया है - भगवान् ने गदा के द्वारा अश्वत्थामा के दिव्यास्त्र का वारण किया। एक जगह कहा है - चक्र के द्वारा। तो स्वामी अखण्डानन्द सरस्वती जी महाराज कहते थे - गदा का द्रुतगति से भगवान् ने (चक्राकार) विन्यास किया तो गदा ही चक्र के रूप में परिलक्षित होने लगी। जैसे कि पंखा तीव्रगति से चले तो उसके तीन पँख जो हैं, आजकल चार पंख, वे दिखाई नहीं पड़ते। चक्राकार पंखा दीखता है। इसी प्रकार से वो छवि गर्भगत परीक्षित के हृदय में अङ्कित हो गई। बच्चे का हृदय बहुत कोमल होता है। गर्भ के बाहर आये.. खेलकूद में परीक्षित ऐसे देखते थे... सामने से जो व्यक्ति आ रहा है क्या यह वही है जिसने गर्भ में मेरी रक्षा की। इसीलिये उनका नाम परीक्षित पड़ा।

तो मैंने यह बताया कि कथा उस ढंग से होनी चाहिए कि विश्व की जितनी समस्याएँ हैं उन सबका समाधान हो। कौन सी ऐसी समस्या है जिसका समाधान भागवत के द्वारा सम्भव न हो? लेकिन वह दृष्टिकोण कथा का आजकल लुप्त है।
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Question: Gurudev, these days on Social media, we come across videos where the Katha-vachak himself stands up on the Vyaspeeth and may dance in all fun and frolic, showing jerky moves. Is this allowed?

Answer- For most people, life is now restricted to fame and fortune. Only a handful of people remain, that seek to utilise Dharma and Adhyatma, in order to serve the purpose of their human birth. To entertain the public by doing everything, be it dancing or singing, in order to attract followers to meet their self-serving interests, this has become a bad habit for many. Katha-vachan too has fallen into such bad habits. The reason for this discord is that, since the rulers are directionless and incapable, lack any class themselves, so the anarchist elements of similar nature tend to obtain their support. However, Keertan has its own importance. It has been described (in scriptures) that even Prahlad took to Keertan in glory of Srimad-Bhagvatam. A Vyaspeeth has its own line of decency which must not be crossed. However, there may be times when a Keertan is more appropriate. Shravan-Keertan are amongst the 9 forms of Devotion. But even Keertan must not be used as a tool to lure people for accumulating fame and fortune. Specially, Srimad-Bhagvatam is a very serious source of literature. It has been unfortunately reduced to merely singing and dancing. I actually believe, that since we do not have stalwarts like Swami Karpatri ji Maharaj, Swami Akhandanand Saraswati ji, Pandit Janaradhan Chaturvedi ji amongst us, the quality of Srimad-Bhagvatam narration has drastically deteriorated. In the name of Ramcharitmanas, we have elements who even resort to doing Keertan in the name of Allah, and other such absurd practices. All such heresy is an outcome of directionless nature of our ruling elite. I have pondered over the fact, that states like Bihar and Uttar Pradesh which never lacked in mental prowess, yet what kind of governance has been meted out to them by leaders from certain parties over the years? I came to the conclusion, that politicians are able to extend their rule when they bring down the society to their own level of modesty. One could be an IAS or IPS, but the order determined by these politicians is kept to such low standards, that it becomes easier for them to rule. British policy was dressed in the same fashion. They intended to dilute the Vyaspeeth-s of India, so that our character and identity is lost. These Katha-vaachaks follow similar a trend. Those who cannot chant even a Shloka, have now become Katha-vaachaks by medium of silly entertainment. It would be much better if they conduct programmes of Keertan instead. Why to disregard an esteemed literature? This way they can dance as much and as joyfully as they want in the name of Bhagwan's Keertan, without spoiling the name of Katha-vaachan.

Because if someone conducts a narration of Ramcharitmanas, which has no praise of Sri Ram's character, how shameful would that be! Srimad-Bhagvatam is in fact a deep literary source.

Thakur ji who is a Katha-vaachak in Vrindavan, his guru Ramanuj ji was a great scholar and amongst my audience since 1972. Rajvanshi Dwivedi ji another esteemed scholar, and a student of Pujya Gurudev, several people studied under him, he too has been my audience. So in the context of Srimad-Bhagvatam, I had once spoken to these scholars that since they were skipping the philosophical aspects of Srimad-Bhagvatam in their narration, some day their students might skip the narration itself, and eventually it happened. Initially, Katha-vaachaks of Srimad-Bhagvatam in Vrindavan, stopped explaining its philosophical aspects to the audience, reasoning its difficulty to be of high standard, but continued with the story-telling part. Now they have left the story-telling too and resorted to singing and dancing. So this kind of degeneracy happens, it would be appropriate if they dedicated themselves to organizing Keertan groups. At least Bhagwat-katha must include story-telling, even if the philosophical aspects are beyond them. It takes minimum 15-20 years of continuous study to be able to appreciate the philosophy of Srimad-Bhagvatam.

I shall give you an example regarding Mahabharata. There were multiple versions of the epic presented by Veda-Vyaas, whose perusal is possible within the Mahabharata itself. There is a version of 24,000 verses, mentioned in the broader epic, and cannot be found exclusively elsewhere, which comprises only the philosophical aspects of the Mahabharata. It does not mention historical events or conversations, for example Bhagwad-Gita contains dialogue between Krishna-Arjuna and Sanjay-Dhritarashtra, while other aspects realized are all philosophical in nature. But to assimilate 24,000 verses of deep philosophy was difficult for an individual. So Bhagwan Veda-Vyaas ji extended those 24,000 verses to present a 'Shata-sahastri Mahabharata', the commonly known Mahabharata of 1 lakh verses, by incorporating historical events. Then he went on to create another Mahabharata of several lakhs of verses, but humanity in the mortal plane is not capable of realizing that version, hence it is narrated only by divine beings like Deval, Asit, Naarad Muni, Vyaas ji and Shukadev ji in the higher planes. So as I said, the original Mahabharata has 24,000 shlokas but to enable a normal human to take its teachings to one's heart, just like adding salt to curry for taste, the philosophy was measurably expanded through historical events. Even yesterday I had mentioned, that the original Srimad-Bhagvatam comprises only 4 shlokas, 'Chatuh-shloki Bhagwat'. But to make the meaning of those 4 shlokas appreciable to humanity, Bhagwan Veda-Vyaas ji presented the expansive Srimad-Bhagvatam. The previous day I had also mentioned, that only one shloka, "janmAdyasya-yatah…" of Srimad-Bhagvatam, if we ponder over it well enough, its exposition itself comprises all the other shlokas. Thus, Darshan (philosophy) is essential for well-being of an individual. But it becomes easy to synthesize when it is expressed through historical events and story-telling. The philosophical aspect is the heart of story-telling. If we were to ignore that, what would remain? At least it must be ensured as far as possible, that the story-telling aspect is not sacrificed, and even if one wants to entertain themselves through singing or dancing, they may do it before or after the Katha-vaachan, within the limits of decency. Women must participate in such functions with utmost modesty. This much I have explained at length, and how these problems exist because of adrift nature of the ruling powers. These politicians know that if Vyaaspeeth remains true to its character, they wouldn't be able to make merry while in power, understood? Because their own character is so pathetic, that it leads them to support these polluting elements. For example, an ideal teacher prefers ideal students, while a lousy one prefers his own kind, the mischievous and lousy ones. At school, whenever we had easy Question papers, I used to say I didn’t enjoy it. Only when it would be a very difficult Question paper, would I be happy.

So as I pointed out, Katha-vachaan is experiencing a phase of degeneracy.

There is one interesting fact, that Swami Akhandanand Saraswati ji would narrate the meaning of 'Katham' through Nirukta (etymological interpretation). Why? Well, all the problems of life and that exist in this world, should have a solution through Katha-vachaan, right? The biggest problem remains Death, or rather the problem of making Death meaningful. Isn't the solution to this problem found in the Bhagwat? The Srimad-Bhagvatam enables you to emerge victorious against fate, to make this your last instance of death, so that you won't have to take birth again.

The objective of Srimad-Bhagvatam was the very salvation of Pareekshit. Here 'Pareekshit' means 'Pareekshya-lokaan' (one who has examined the world of experiences), based on this Shruti the name 'Pareekshit' has been given. The Supreme lord protected Pareekshit with a Mace, against Ashwatthama's Divya-astra, by appearing in his womb, or with a Chakra as mentioned in one instance, so these 2 conflicting descriptions have been mentioned in Srimad-Bhagvatam. Hence, Swami Akhandanand Saraswati ji used to say Bhagwan moved his Mace swiftly in circular motion, so the Mace itself appeared like a Chakra, just like how the 3 or 4 wings of an electrical fan appear to move like a wheel when rotating in speed. This image was registered in Pareekshit's memory while still in womb. An infant's memory is very tender. When finally out of womb, and Pareekshit used to play, he would look whenever a person would come from the front towards him, whether he was the same person who protected him in his womb. That’s why he was named 'Pareekshit'. The name 'Parikshit' with a 'Hrasva' vowel does not exist by Kalpa-bheda in the Mahabarata,. 'Pari-rakshit', due to him being saved from death, the seed of Kuru clan was protected. If he too had fallen, the entire Kuru dynasty would have ended with him. So as I said, Katha-vachan should proceed in a way, that all problems in the world cease to exist. Is there any obstacle which cannot be overcome by Srimad-Bhagvatam? But that direction in the art of story-telling is missing these days. [ Dhanyavādaḥ to volunteers — English translation: Raj Pandey ji ]

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Watch video here - https://www.youtube.com/watch?v=aqKFqrUu-DY


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